रायगढ़। NR इस्पात का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है, विधानसभा में भाजपा विधायक पुरंदर मिश्र के सवालों का गलत जवाब देकर जहां वन विभाग बुरी तरह फंस गई है वहीं NR इस्पात के विभागीय सांठगांठ और विधानसभा तक को गुमराह करने की कोशिश से आहत विधायक काफी नाराज हैं। कहा जा रहा है कि जल्द वे सरकार पर NR इस्पात के जमीन आबंटन समेत कुछ मामले की जांच के लिए सरकार पर दवाब बना सकते हैं और EOW को इसके जांच का जिम्मा भी दिया जा सकता है। जांच का नतीजा निकलते निकलते तो देर होगी लेकिन इस उद्योग के लिए काफी मुश्किल हालत बन सकते हैं और इनका प्रोजेक्ट डिले हो सकता है।
विधायक पुरंदर मिश के द्वारा विधान सभा में उठाने के बाद मुनादी डॉट कॉम द्वारा इस मामले को पूरी तरह उजागर कर कर दिया। इसके बाद NR समूह और वन विभाग में हड़कंप मच गया है । वहीं राजनीतिक हलकों में भी इसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म हैं और सूत्रों की माने तो जल्द ही इस मामले में EOW की एंट्री हो सकती है।
दरअसल विधान सभा में वनभूमि पर अतिक्रमण से जुड़े गंभीर प्रकरण POR क्रमांक 4946/05 को जानबूझकर छिपाए जाने के आरोपों ने NR इस्पात और वन विभाग दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यह वही मामला है जिसे विधान सभा में पूछे गए सवालों के दौरान सामने आना चाहिए था, लेकिन कथित तौर पर विभागीय स्तर पर इसे दबा दिया गया। अब इस चूक को सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि विधानसभा को गुमराह करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
विधानसभा में विधायक पुरंदर मिश्र द्वारा जब NR इस्पात को दिए गए जमीन आबंटन और वनभूमि अतिक्रमण को लेकर सवाल उठाए गए, तब यह अपेक्षा थी कि वन विभाग सभी संबंधित प्रकरणों और दस्तावेजों को पूरी पारदर्शिता के साथ सदन के समक्ष रखेगा। लेकिन विभाग ने POR 4946/05 का उल्लेख ही नहीं किया। अब जब यह तथ्य सामने आया है, तो विभाग द्वारा दिए गए जवाबों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
सूत्रों की मानें तो POR 4946/05 ऐसा प्रकरण है, जो सीधे तौर पर NR इस्पात की परियोजना से जुड़ा है। यदि इसे विधानसभा में प्रस्तुत किया जाता, तो उद्योग की वैधानिक स्थिति पर गंभीर प्रश्न उठते और जमीन आबंटन की पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ जाती। यही वजह मानी जा रही है कि इस महत्वपूर्ण दस्तावेज को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया।
मामले में अब राजनीतिक पारा भी चढ़ता जा रहा है। चर्चा है कि विधायक पुरंदर मिश्र इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच के लिए सरकार पर दबाव बना सकते हैं। यदि ऐसा हुआ, तो आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) को जांच सौंपी जा सकती है। EOW की एंट्री होते ही जमीन आबंटन, वनभूमि उपयोग, विभागीय नोटशीट और निवेश स्रोतों की गहन जांच तय मानी जा रही है।
इसी बीच यह आशंका भी राजनीतिक हलकों में जोर पकड़ रही है कि NR इस्पात के इस बड़े प्रोजेक्ट में कथित छत्तीसगढ़ कोयला घोटाले से जुड़े धन का इस्तेमाल हुआ हो सकता है। यही कारण बताया जा रहा है कि उद्योग को अब तक असामान्य प्रशासनिक संरक्षण मिलता रहा। उल्लेखनीय है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में NR इस्पात ने राज्य में दूसरा सबसे बड़ा निवेश प्रस्ताव (MOU) किया था।
अब सवाल साफ हैं वन विभाग ने विधानसभा को गुमराह किया? और क्या NR इस्पात को राजनीतिक रसूख के चलते कानून से ऊपर रखा गया? यदि इन सवालों के जवाब जांच में “हाँ” की ओर जाते हैं, तो यह मामला केवल वन अधिनियम के उल्लंघन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संवैधानिक संस्था विधानसभा को गुमराह करने के गंभीर आरोपों में तब्दील हो जाएगा। फिलहाल, जांच की आहट और EOW की संभावित धमक ने NR इस्पात के प्रोजेक्ट अनिश्चितता और मुश्किलों के पेंच में फंसता दिखाई दे रहा है।

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